Saturday, February 27, 2021
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Rajasthan Sri Ganganagar Petrol Price Rs 100; Why Petrol Diesel Prices Are High In India Despite Lower Crude Prices? | पेट्रोल-डीजल पर महीने के कुल बजट का महज 2.4% ही खर्च करते हैं लोग, फिर कीमत बढ़ने पर हंगामा क्यों?

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एक घंटा पहले

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राजस्थान के श्रीगंगानगर में रहने वाले शमशेर ने बुधवार को पेट्रोल खरीदा तो उन्हें 1 लीटर के लिए 100 रुपये चुकाने पड़े। देश के अन्य हिस्सों में भी पेट्रोल और डीजल के दाम सेंचुरी की तरफ बढ़ रहे हैं। 2021 के शुरुआती 47 दिनों में ही पेट्रोल 5.58 रुपए और डीजल 5.93 रुपए प्रति लीटर महंगा हुआ है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगी इस आग से आपके घर का बजट कितना बिगड़ेगा?

2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत के 4.5% घरों में कार और 21% घरों में मोटरसाइकिल है। कंजप्शन एक्पेंडिचर सर्वे (2011-12) के मुताबिक प्रत्येक व्यक्ति अपने महीने के कुल बजट का महज 2.4% ही पेट्रोल-डीजल खरीदने पर खर्च करता है। इसलिए कुछ लोग दावा करते हैं कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने का आम आदमी के घरेलू बजट पर कोई सीधा असर नहीं होता। हालांकि ये पूरा सच नहीं है।

भारत में पेट्रोल और डीजल की सबसे ज्यादा खपत ट्रांसपोर्ट और एग्रीकल्चर सेक्टर में होती है। दाम बढ़ने पर यही दोनों सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। चूंकि ये भारत के आम आदमी से जुड़े सेक्टर हैं। इसलिए पेट्रोल डीजल की कीमतें अप्रत्यक्ष रूप से भारत के आम आदमी की जेब पर ही असर डालती हैं।

एग्रीकल्चर सेक्टरः डीजल की महंगाई में खप जाती है MSP की बढ़ोतरी
राजस्‍थान के भरतपुर के रहने वाले किसान अवधेश शर्मा बताते हैं एक एकड़ गेहूं की फसल तैयार करने में करीब 140 लीटर डीजल की खपत होती है। पिछले पांच महीने में राजस्थान में डीजल की कीमत में करीब 8 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। इसके चलते प्रति एकड़ गेहूं की लागत 1166 रुपए बढ़ गई।

किसान एकता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष सोरन प्रधान बताते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक एकड़ खेत में गेहूं की फसल में 200 लीटर डीजल और धान की फसल में 600 लीटर डीजल लगता है। यानी एक एकड़ की दोनों सीजन की खेती में करीब 800 लीटर डीजल खपता है। 15 फरवरी 2020 को आगरा में 64.77 रुपए प्रति लीटर था। एक साल में 15.25 रुपए प्रति लीटर दाम बढ़कर 80.02 रुपए हो गए। यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान की एक एकड़ खेती की लागत 12,200 रुपए बढ़ गई।

अवधेश और सोरन दोनों कहते हैं कि राजस्‍थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सिंचाई में ज्यादा डीजल खर्च होता है। यहां मुश्किल से 30-40% किसानों के पास ही ट्यूबवेल है। खेत दूर-दूर हैं और 2-3 एकड़ वाले किसान ट्यूबवेल नहीं लगवाते।

हालांकि पंजाब में स्थितियां अलग हैं। कीर्ति किसान यूनियन के उपाध्यक्ष रजिंदर सिंह कहते हैं कि यहां के किसान सिंचाई के लिए बिजली का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए एक एकड़ खेत में एक साल में 90 लीटर तक ही डीजल लगता है। पंजाब में डीजल के दाम में एक साल में 17.69 रुपए की बढ़ोतरी हुई है। इसलिए पंजाब के किसानों की लागत 1592 रुपए प्रति एकड़ बढ़ गई। किसान एक्टिविस्ट रमनदीप सिंह मन के मुताबिक, सरकार फसलों पर कमोबेश इतना ही एमएसपी बढ़ाती है। एमएसपी में हुई बढ़ोतरी तो डीजल की महंगाई में ही खप जाती है। जबकि एमएसपी बढ़ाकर सरकार किसानों की कमाई बढ़ाने का दावा करती है।

ट्रांसपोर्ट सेक्टरः महंगे डीजल से मुश्किल हो रहा बिजनेस
छत्तीसगढ़ के भिलाई में रहने वाले ट्रांसपोर्टर देवेंद्र दुबे कहते हैं, ‘डीजल के दाम बढ़ने से रोज ही ट्रांसपोर्टर और ग्राहकों के बीच लड़ाई की नौबत आ रही है। जब डीजल 60 रुपए लीटर था तब हम 32-33 हजार में एक ट्रक माल रीवा ले जाते थे। डीजल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं लेकिन व्यापारी माल ढुलाई का दाम बढ़ाने को तैयार नहीं हो रहे। अब डीजल का दाम 86 रुपए लीटर हो चुका है, ऐसे में ढुलाई का दाम भी 43% बढ़ जाना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। ऐसे में बिजनेस मुश्किल होता जा रहा है।’

पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के मुताबिक, भारत के कुल कामगारों में से 3% रोड ट्रांसपोर्टेशन की नौकरियों में लगे हैं। केरल जैसे राज्यों मे यह अनुपात 6.5% है। इस सेक्टर में काम करने वाले 1.1 करोड़ लोगों में से 40% खुद का रोजगार चला रहे हैं। ट्रांसपोर्ट सेक्टर की मुश्किल बढ़ने से इन लोगों की नौकरियों और बिजनेस पर भी असर पड़ेगा।

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के सेक्रेटरी जनरल नवीन गुप्ता कहते हैं, ‘कोविड-19 के चलते ट्रांसपोर्टेशन की मांग पहले ही करीब आधी थी। ऑपरेटर घाटे में थे और खर्च नहीं उठा पा रहे थे ऐसे में पेट्रोल-डीजल के बढ़े दामों ने स्थिति को और खराब किया है।’

इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एंड इकॉनमिक चेंज (ISEC) में प्रोफेसर डॉ डी राजशेखर कहते हैं, ‘बढ़ते दाम एक पूरे चक्र का निर्माण करते हैं। जिसमें सामान्य आदमी पर हर तरफ से महंगाई का जोर आता है और मांग घट जाती है। जब सरकार इकोनॉमी को ग्रोथ के रास्ते पर लाने की कोशिशें कर रही है, उस वक्त पर पेट्रोलियम उत्पादों की ऊंची कीमतों से गरीबों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, किसानों की कमाई और मांग दोनों निचले स्तर पर चली जाएंगी।’

सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतें घटा क्यों नहीं देती?
दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 89.29 रुपये है। इसमें 32.90 रुपये केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी और 20.61 रुपये राज्य सरकार वैट वसूलती है। इसी तरह डीजल के दाम 79.70 रुपये प्रति लीटर हैं जिसमें 31.80 रुपये केंद्र और 11.68 रुपये राज्य सरकार के हिस्से जाता है। देश के अन्य हिस्सों में भी पेट्रोल और डीजल पर लगने वाला टैक्स 60-70% तक है।

हाल ही में कांग्रेस ने एक ट्वीट में लिखा, ‘18 अक्टूबर 2014 को मोदी सरकार ने डीजल पर मिलने वाली सब्सिडी को खत्म कर इसका बोझ आम जनता पर डाल दिया, तब से लेकर आज तक सरकारी लूट चालू है।’ राहुल गांधी ने लिखा, ‘जनता महंगाई से त्रस्त, मोदी सरकार टैक्स वसूली में मस्त।’

विपक्ष ने पहले भी मांग उठाई थी कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों को दोबारा नियंत्रित करना चाहिए और आम लोगों को राहत देनी चाहिए। लेकिन पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने साफ कर दिया कि सरकार फिर से तेल पर नियंत्रण पर कोई विचार नहीं कर रही है।

वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं कि महामारी की वजह से सरकार की आमदनी घटी है और खर्च बढ़ा है। ऐसे में सरकार रेवेन्यू बढ़ाने और फिस्कल डेफिसिट को कम करने के लिए पेट्रोल-डीजल पर टैक्स कम नहीं करना चाहती।

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